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Monday, April 21, 2014

Politics? Simple!

“Life is really simple, but we insist on making it complicated.” ~ Confucius

The Indian citizen like India itself is a “Sleeping Elephant”. It revels in self-imposed sloth until the elections arrive and then goes on a rampage like a drunken elephant on a full moon night. The sloth and the rampage both are rooted in the classical Indian psyche. First, let us understand our predilection to sloth. When confronted with choices, we are more likely to choose the option in which our own house remains clean but the street in front can remain filthy. And, having pronounced “this nation is beyond redemption”, we repose in front of TV screens. Siesta for Indians is craftily distributed over twenty four hours of a day.

Second, Indians are a restless people when awake and outside the comfort of their homes. Doctors’ waiting rooms, roads and queues of all kinds are testimony to our basic instinct of catching up on lost-on-purpose time. Specially, national or regional politics cracks us up big time. Our zeal to ameliorate the nation or state begins with “Enough is enough”, swells to “Enough is not enough” and reaches its climax with much physical and emotional violence. Groggy after extended sloth, like zombies, we march to the beat of wily politicians. And, our political idols will send us to hunt innocents like that somnambulist from Dr Caligari’s cabinet.

Indians hate simplicity. Our music, arts, culture and psyche, all are relatively more complicated and of higher-order than what is found in most other world civilizations. Being complicated itself is not bad. It produces incredible beauty and variety as evident in Indian music, paintings, languages, dance forms and food. Sooner or later we must gravitate away from the simplicity of Kabir, Bhagwad Gita, Guru Nanak and Rahim to the garishness of Bhagwati Jagrans, Sai Bhajan Sandhyas and ostentatious weddings.

A complicated psyche poses a special challenge when it comes to making political choices and governing people. The complications in our psyche arise out of wide disparity in people’s incomes, regional economic development and social histories. This stitched together “vibrancy” [sic] is what wily politicians intend to take advantage of. They divide people exactly on these fault lines before elections and then exhort them to come together again in the ‘larger national interest’. This is the destructive manifestation of our national complexity.

So, is there hope? Fortunately, yes! The answer lies in breaking down the destructive complexity into simpler, more manageable forms. It’s like devolution of species from complex forms to single-cell forms or the mathematical concept of Fourier Transformation (FT), where we break down a seemingly random waveform into a number of regular wave forms.

In terms of politics, this means our capability to break our wish list down into simpler, closer-to-everyday-life issues that matter to everyone, including those at the bottom of the pyramid e.g. Food-water-shelter, Hygiene, Education, Healthcare, Employment and Safety. To that end, the role of our political leaders is limited to governance and not actual execution of actions that will fulfill these essential needs of citizens. Political leaders are the people-appointed trustees who as part of their dharma will ensure equitable and optimal distribution of national resources such as to maximize welfare of the people.

A politician who is corrupt, communal or criminal is incapable of following this dharma and thus unworthy of people’s trust. We must therefore examine the political choices in front of us first and foremost on their past record and capability of following this dharma. Spare yourselves the analysis of complex scenarios spun like cobwebs by wily politicians and demagogues lest you soon find yourself stuck like a helpless fly in the spider’s web.

Keep it simple stupid!   

“Simplicity is the ultimate sophistication.” ~ Leonardo da Vinci

Sunday, December 29, 2013

नीचे उतर घुड़सवार!

अरविन्द केजरीवाल को मुख्य मंत्री बने दो दिन भी नहीं हुए कि बीमार पड़ गए। चुटकी लेने वालों कि मौज हो गयी, चाहे अधमरे कांग्रेसी हो या नामो भक्त।  "देखा! ज़िम्मेदारी निभाना अलग चीज़ है और चुनावी वायदे करना अलग!" से लेकर "हर शख्स मोदी नहीं होता!" इत्यादि।

अरविन्द कि टीम के सभी साथी रामलीला मैदान से सीधे अपने-अपने विभागों के कामों में जुट गए।  कहीं बाबुओं कि खोज ख़बर, तो कहीं जनसम्पर्क। सन्डे सुबह मैं भी एक मंत्री के साथ रहा कुछ समय। लोगों का उत्साह देखते ही बन रहा था, इतनी उम्मीदें, इतने सुझाव और ढेरों वालंटियर। ऐसे दृश्य पिछले चार दशकों में तो कभी नहीं दिखे। राजनैतिक बदलाव ही नहीं, फ़िज़ा ही नयी है। उपरवाले कि भी मर्ज़ी लगती है, वरना जो पिछले एक दो वर्षों में हुआ, वो किसी ईश्वरीय शक्ति के बिना सम्भव नहीं हो सकता।

काम का पहाड़ खड़ा है। हर विभाग, तमाम प्रणालियाँ और ज़्यादातर करमचारीयों और अफसरों कि कमर भ्रष्टाचार ने तोड़ रक्खी है। 'राग दरबारी' सा माहौल है। उसके ऊपर अपेक्षाओं का अम्बार। जनता-जनार्दन कि तो ठीक, BJP के समर्थकों और आर्मचेयर दार्शनिकों के क्या कहने। जो काम कांग्रेस और बीजेपी ४० सालों में न कर सके, वो आम आदमी पार्टी और केजरीवाल, चार दिनों में नहीं तो कमसकम चार महीनें में तो कर ही दें। पढ़े-लिखे मित्र पिले पड़े हैं फेसबुक और ट्विटर पर, कोई बीजेपी के वियोग में चूड़िया तोड़ रहा है तो कोई दिन गिन रहा है कि कब AAP कि सरकार सरके और कब किसी और राज्य के मुख्यमंत्री कि उपलब्धियां गिनवा कर दिल्ली में चुनाव जीतें। अजीब दृष्टिकोण है -- जिन दलों के पिछले ४०-५० सालों के कुशाषन का नतीजा देश भुगत रहा है, उसी कि वापसी कि दुहाई मांग रहे हैं?!

एक नयी सोच के लिए अपने मौजूदा वैचारिक बहाव को रोक संतुलित विश्लेषण करना पड़ता है। नौजवान थोड़ा जल्दी कर लेते हैं, और निठल्ले दार्शनिक  थोड़ी देर से। AAP कि विचारधारा और कार्यशैली का मूलमंत्र हैं 'Volunteership', यानि, निस्वार्थ सेवा, बिल्कुल जैसे हम सब मंदिरों और गुरुद्वारों में करते हैं। लिहाज़ा ये ग्लैमरस नहीं हैं और वैचारिक सादगी कि हमें आदत नहीं है। गए शुक्रवार को दफ्तर में एक इंजीनियर ने मुझसे कहा, "सर, जितवा तो दिया, अब आपके केजरीवाल कुछ काम भी करेंगे या नहीं?" मैंने उसे पकड़ा और कहा, "भाई, सबसे पहले तुम चौधराहट कि आरामकुर्सी से उतर वालंटियर बनों और सुधारकार्यों में कन्धा लगाओ। अपने घर-कालोनी के आसपास सफाई, चिकित्सा सुविधाओं, कानून व्यवस्था को सुधारने और भ्रष्टजनों को तारने में सहयोग करो। केजरीवाल ने कहा है कि हर दिल्ली वाला मुख्यमंत्री है। छाती फाड़ कर खड़े हो जाओ भ्रष्ट और निक्कमें बाबुओं और करमचारियों के सामने और अपने काम करवाओ।  हाँ, अगर कोई ईमानदार और कर्मठ हीरा मिले तो शाबाशी देना मत भूलना। वो रीढ़ कि हड्डी है आम आदमी कि सरकार की।" इंजीनियर बेचारा "बट सर...बट सर..." करते करते समझ गया कि आधा खाली गिलास, आधा भरा कैसे बनता है।        

कहीं आप भी किसी बड़ी राजनैतिक विचारशैली के घोड़े पर सवार तो नहीं? आइये, हाथ थामिये हम पैदल सवारों का और उतरिये भारत माँ कि लिए कर्मभूमि पर।

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए

जय हिन्द! वंदे मातरम!!  

Friday, August 23, 2013

शहर में नया मॉल आया है, गाड़ी निकालो! (भाग - III )

(भाग - III )

तन्वी सिल्की और हरीश को "कहाँ हो बेटा" वाला फ़ोन करती हैं। हरीश विडियो गेम आर्केड में सारे पैसे लूटा कर अमीरों के छोटे बच्चों को गेम खेलने के गुर सिखा रहा है, "बोनस ले लो, ऊपर लटक रहा है", और सिल्की अपने फेव कलर ऑरेंज में वेरो मोडा की ड्रेस खरीद कर अपने Whatsapp ग्रुप में इर्ष्या की वेव क्रिएट करने की कोशिश में लगी है। सब तरफ़ से 'ओसम', 'फैब' और 'Cuteeee' के सन्देश आ चुके हैं सिवाए इशिका के। चिंता का विषय है क्यूंकि इशिका स्टाइल क्वीन है DPS रोहिणी की। उसका हल्का सा 'nyc' ही आ जाता...

अहुजास विद ट्राली फ़ूड कोर्ट में एकत्रित हो चुके हैं। हरीश पोप्स के हाथ में ट्राली देख कर भड़क जाता है, "इसमें शो ऑफ करने वाली क्या बात है? बिग बी इज़ सो मिडिल क्लास!" करमबीर तन्वी को घूरते हैं और तन्वी हरीश को। हरीश मौके की नज़ाकत समझ जाता है और सिल्की के साथ बैठने की जगह ढूँढने निकल पड़ता है। नज़ारा इनामी दंगल का है। हर एक खाली होती सीट के लिए तीन प्रत्याशी। सिल्की और हरीश का शर्म से बुरा हाल हो रहा है। झेंप मिटाने के लिए दोनों KFC का मेनू पढ़ने लग जाते हैं। 

करमबीर दूर से ही चीज़ों के रेट पढ़ कर घबरा रहे हैं। 70 की नान, 325 का सिज़्लर और 125 का चाऊमीन देखकर थाली को भी वन-बाई-टू खाने वाले करमबीर को ऐसे लगता है की वो वो गरीब है जिसके घर राहुल गाँधी आ गया है। इसके विपरीत, तन्वी ऐसे मौकों को समथिंग डिफरेंट ट्राई करने के लिए यूज़ करती हैं। एक सरदार फैमली बड़े मम्मी की परेशानी देख कर करमबीर और तन्वी को इशारा करते हैं की उनकी सीट खाली होने  वाली है। ठीक उसी वक़्त तन्वी का मोबाइल बजता है "ॐ साईं नमोनमः" रिंग टोन के साथ। ज़ाहिर है सीट साईं कृपा से मिली है। तन्वी ने तुरंत शिर्डी से आती हवा को गले लगा लिया। 

हरीश और सिल्की KFC की लेटेस्ट एड वाली चिकन बकेट लेते हैं। सिल्की संस्कारी है। आचमन के लिहाज़ से चिकन बकेट की तस्वीर Whatsapp करके खाना शुरू करती है। क्यूंकि खाना अंग्रेजी है, इसीलिए 'yummeeee' का उद्घोष निरंतर चलेगा। तन्वी 325 वाला सिज़्लर, खुशबू और गोलू मैकडी का हैप्पी मील (खिलोने के लिए), कमला आहूजा राज कचोरी और करमबीर पंजाबी थाली विद नो शेयरिंग। उसके बाद ज्ञानीज़ आइसक्रीम और संडी, कुल मिलाकर कर अर्थव्यवस्था को 1500 रूपये से ज्यादा का झटका। करमबीर ने हिसाब लगाया की 'आपकी बचत', 'आपका नुकसान' बन चुकी है।

लेकिन सब ख़ुश हैं। अगर मिसेस यादव मिल जातीं तो और समां बंधता। तन्वी का मन किया की मिसेस यादव को फ़ोन करके कहे, "हे हे, क्या बात है, मॉल में खाना नहीं खाया?" खैर, अगली किट्टी कौनसी दूर है, वहीँ निबटेगी उस लोमड़ी को। 

अहुजास की नई हुंडई वेरना SX अभी पंजाबी बाग़ ही पहुँची है और तन्वी सो चुकी हैं, चेहरे पर अभिमान और मुस्कान लिए।     




Thursday, August 22, 2013

शहर में नया मॉल आया है, गाड़ी निकालो! (भाग - II)

(भाग - II)

करमबीर, तन्वी, गोलू और खुशबू योद्धाओं की तरह 'बिग बी' यानी 'बिग बाज़ार' तीर्थ की और बढ़ते हैं। तन्वी जी के दिमाग में ख़रीदारी की लिस्ट लगातार अपडेट हो रही है और साथ-साथ डिस्काउंट की अपेक्षा भी। पिछली दफ़े, कोक और सेनेटरी पैड्स पर वन-फॉर-वन था, रिफाइंड पर पाँच लीटर पर एक लीटर फ्री, चीनी पर भी पाँच किलो पर एक फ्री और वाशिंग पाउडर के साथ बाल्टी फ्री। आज क्या मिलेगा, तन्वी ये सोच ही रही थी की उसका दिल धक् से रह गया। पड़ोस की मिसेस यादव सामान से लद्दी ट्राली लिए उन्हें चेकआउट लाइन से वेव कर रहीं थी। एक बार तो मन किया की पूछ आये की क्या क्या बेस्ट ऑफर्स हैं लेकिन स्वाभिमान ने उन्हें रोका और दूर से ही वेव कर दिया।

ग़ज़ब की भीड़, जैसे एकादशी के भंडारे में मज़दूर और रिक्शे वाले आलू-पूरी के लिए भसड़  मचाते हैं। लदी ट्रालीयाँ के अन्दर थके बच्चे सामान की तरह पड़े हुए। सब तरफ सामान, बैनर्स और डिस्काउंट बताते लेबल। लेकिन तन्वी जी एक प्रो की तरह सबसे पहले वहीँ गयीं जहाँ सर्वाधिक मारकाट मची हुए थी: 'करियाना' सेक्शन में। चावल पे वन-फॉर-वन की ज़बरदस्त ऑफर थी और रिफाइंड-चीनी-चावल पर कॉम्बो डील।  शेरां वाली का नाम लेकर उन्होंने करमबीर को एक कॉम्बो लोड करने को कहा। अच्छी शुरुआत, जैसे डिंडा की पहली बॉल पर चौका जड़ दिया हो।

करियाने में उत्पात मचाने के उपरान्त अहुजास बरास्ता वाशिंग पाउडर सब्जी सेक्शन में पहुंचे। प्याज़ 50 रूपये किलो देखते ही तन्वी को चक्कर सा आ गया।  कहाँ 80 ले रहीं थीं इतने दिनों से और यहाँ? सेल्समेन ने तन्वी जी को पांच किलो-पर-बिल की लिमिट पर ही रोक दिया। लघु निराशा।

करियाने, टाइड, सब्जियों, हार्पिक (फ्री टॉयलेट ब्रश के साथ), बाबाजी के रस, प्रिया गोल्ड के होलसेल पैक और गोलू और खुशबु के आइटम्स से लद्दी ट्राली अब सम्मानजनक स्थिति में आ चुकी थी। तन्वी का मन किया की ट्राली समेत जा कर देखे की मिसेस यादव क्या अभी भी चेकआउट लाइन में हैं या नहीं। बड़ी आई।

ECG रिपोर्ट जितना लम्बा बिल देख कर करमबीर का दिल बैठ गया लेकिन तन्वी, गोलू और खुशबु के चेहरे पर विजयी तेज देख कर संभल गए। कुल मिलाकर 3494 का बिल और आपकी बचत 270 रूपये। करमबीर ने 20-20 रूपये वाले जूट बैग के लिया मना कर दिया वरना 'आपकी बचत' 190 रह जाती। अगला पड़ाव फ़ूड कोर्ट था, गोलू और खुशबु के मॉल आने का मुख्य कारण। करमबीर ने सुझाव दिया की पहले सामान कार में रख आते हैं ताकि ट्राली के झंझट से मुक्ति मिले लेकिन तन्वी ने उन्हें "तुम कब सुधरोगे" वाली लुक दी और धीरे से समझाया की फ़ूड कोर्ट में कहीं मिसेस यादव मिल गयीं तो?


Wednesday, August 21, 2013

शहर में नया मॉल आया है, गाड़ी निकालो! (भाग - I)

(भाग - I)

पश्चिमी दिल्ली का नया चमचमाता मॉल, हाजिरी भरने वालों की धक्कमपेल और सामने वाली सड़क पर ट्रैफिक जाम। EMI के बोझ से लद्दी गाड़ियाँ मेन गेट पे रूकती, चुलबुले, मोटे ताज़े बच्चे उच्चक कर बाहर निकलते और पीछे-पीछे अभिभावक। आहूजा फैमली की नयी हुंडई वेरना SX भी अभी खाली हुई है।  हरीश आहूजा, बी टेक सेकंड इयर, को कार के दरवाज़ों की 'ढप्प' वाली आवाज़ कूल लगती है इसीलिए खामखा अपनी साइड वाला दरवाज़ा दो बार बंद करता है। बड़े मम्मी (भूतपूर्व 'दादी'), जो की भारतीय स्वाभिमान की तरह धीरे-धीरे, दुखी मन से लगभग एक युगांत पश्चात बाहर निकलने में सफल हुई हैं, की साइड वाले दरवाज़े को ढप्प से बंद करने की जिम्मा भी हरीश ने हथिया लिया है। हरीश का इरादा अमरीका जाने का है।  हॉलीवुड फिल्मों में ढप्प की आवाज़ कुछ और ही होती है।

परिवार के मुखिया, करमबीर आहूजा, पेशे से ठेकेदार, ड्राईवर को देने की लिए पैसे गिन रहे हैं। तीस की पार्किंग और बीस का चाय-समोसा, कुल पचास। उनके पास मिनिमम सौ का नोट है, साला बाकी पैसे वापिस नहीं करेगा, इसीलिए हरीश से पचास मांग कर ड्राईवर को देते हैं, हालाँकि उन्हें पता है की इस इमरजेंसी असिस्टेंस के बदले, IMF की तरह, हरीश पांच सौ से कम में नहीं मानेगा। गाड़ी पार्किंग की ओर और मंजिल सामने। बाल कलाकार गोलू और खुशबू पहले ही सिक्यूरिटी चेक के पार लग चुके हैं। हरीश और सिल्की आगे-आगे चलते हैं अपने-अपने स्मार्ट फ़ोन और बालों को सहलाते हुए। उनके दोस्तों को WhatsApp पर सन्देश भेजे जा चुके हैं। मिस्सेस आहूजा, सॉरी, तन्वी आहूजा अपने पति करमबीर आहूजा से थोड़ा हट कर चल रही हैं। कितनी बार कहा है की जीन्स और टी-शर्ट पहन लो और हेयर डाई कर लो। तन्वी जी तो कल तीन घंटे की शिफ्ट लगा आई हैं पड़ोस के पारलर में, हेयर कलर, फ़ेशिअल और वैक्सिंग।

बड़े मम्मी, यानि कमला आहूजा, शरीर से भारी और घुटनों से कमज़ोर हैं। भारतीय अर्थ व्यवस्था की तरह हिचकोले लेकर चलती हैं। देखने वाला भी हैरान। कभी लगता है की दायीं तरफ लुढ्केंगी तो कभी बायीं ओर, लेकिन नहीं, विकास हो रहा है। धीरे-धीरे बड़े मम्मी माल की और अग्रसर हैं। बड़ा मना किया की मुझे घर पर ही छोड़ जाओ लेकिन तन्वी ने पिछली किट्टी में डींग हांक दी की हम तो बड़ों की बहुत रिस्पेक्ट करते हैं और जहाँ भी जाते हैं बड़े-बूढों को साथ लेकर जाते हैं। घुटनों का दर्द से कहीं ज्यादा "बालिका वधु" का विछोह। खैर, डेरा जमा लेंगी कहीं पर और सिल्की वहीँ पर आइसक्रीम वगेरह ले आयेगी। पिछले बार गुडगाँव के माल में थक कर गलती से एस्केलेटर पर ही बैठ गयी थीं। माता की कृपा से दुर्घटना टली।

आहूजा खेमे में मंत्रणा हो रही है। सब अपने-अपने कम्फर्ट ज़ोन के हिसाब से स्ट्रेटेजी बना रहे हैं। हरीश गेमिंग ज़ोन में जा पसरेगा, सिल्की वेरो मोडा में, बड़े मम्मी लिफ्ट के पास वाले सोफ़े पर और बाकी बिग बाज़ार में। हरीश टोकता है, "'बिग बी' पोप्स, नॉट 'बिग बाज़ार'!" हरीश और सिल्की, पोप्स से पैसे ऐंठ कर, ज़ल्दी से बाय कहके खिसक जाते हैं। करमबीर बड़े मम्मी को पेप्सी ला कर देते हैं और तन्वी, गोलू और खुशबू के साथ बिग बी की और बढ़ते हैं।



Tuesday, August 13, 2013

Be Happy, India!

As the Independence Day draws near, every Indian is in introspective mood. Everyone seems to be cynical and unhappy even after 66 years of self-rule. Perhaps there are a few reasons for us to be unhappy, but, largely, we have everything going for our great nation. Here are a few snippets of why Indians should be a happy lot. 

If you are a Soldier: As long as you are alive, be happy because we give you free ration, subsidized travel and admission quota for engineering, medical and other colleges. And, should you die, your family should be happy because, according to the “Bhim Singh Paradox”, they made you a soldier only to get you martyred and collect compensation.

If you a Student: Be happy because you can become an engineer, doctor, MBA, architect, or whatever else you would like to become, by simply buying a degree from those colleges growing out of agricultural land just outside city’s municipal limit. And, should you not find an engineering job in this failing economy, be happy because you can join a call center for Rs 10,000 a month, the same salary a driver earns in Delhi. Your happiness should further increment when you consider the easy availability of drugs from that parking attendant of your call center.

If you a Common Man: Be happy because the government at least serves you after taking bribes. Be happy for those potholed roads, crumbling healthcare, falling bridges, poisoned water, vegetables and fruits, toxic air, runaway inflation, vanishing jobs and cruel nexus of politicians and police. You know things could be worse in Kalyug, don’t you?  

If you are a Woman: Be happy because you were allowed to be born and got to live. Be happy because you get home safe from work every night without getting raped. Be even more happy because the judge in the court merely ‘asks’ you to recount the rape in graphic detail and not perform the act all over again.

If you are a Journalist: Be happy because you get to pull off the greatest con job in a democracy. You can sell your integrity to the highest bidder while being mistaken for the upholder of a nation's conscience.

If you are a Policeman: Be happy because the politicians’ boots are made of licorice. Be happy because those goats and sheep are so afraid of the law that you can get away with daylight murder. Be happy that yours is a job no one can take away. You can only be transferred to another hunting patch.

If you are Poor: Be happy because poverty is just a state of mind and your sunken stomach, hopeless eyes and diseased body are mere artifacts.

And, if you are a Politician: Well! Be happy without a reason!!

Happy Independence Day! 
Be happy, India!!

Thursday, August 1, 2013

Breaking News: Faking News Ceases Operations!

In what might come as a huge shock to the fans of Faking News, Network 18 Group, owners of Firstpost, citing competition from main stream TV news channels and political parties, has decided to close down Faking News! Firstpost had acquired Faking News only recently.

B Sai Kumar, Group CEO of Network 18, addressing a packed press conference on he sidelines of the 'Media Summit 2013' in Hotel Leela in Mumbai, told reporters that the competition from deep-pocketed TV channels and spokespersons of major political parties was intense. We at Firstpost/Faking News are simply not able to beat the natural born satirists that abound on TV and in print media. While our inhouse team, lead by editor Rahul Raushan, the guy whom we made rich, and our regular contributors are able to churn out only three to four stories a day, the main stream media floods people’s senses with mind boggling stories 24 hours a day. They have successfully obliterated the boundary between news reporting and satire. No one knows any more what is real and what is fake!”

We also caught up with Rahul Raushan, the man behind Faking News, in his plush new office in Mumbai overlooking the Marine Drive. With his usual chutzpah he said that “Competition in satire is here to stay. While until recently, it was a novelty waiting to be creatively (read ‘commercially’) exploited by stand up comedians, occasional columnists and websites like Faking News, today it’s a problem of plenty. In fact, it was in the wake of such realization that I decided to sell Faking News to Firstpost, who had been chasing me for quite some time. They sorely needed to catch up with the likes of Times Now, NDTV and Times of India to shore up humour and satire in their news reports and talk shows, and I was looking for a way out. It was a win-win situation!”


B Sai Kumar, in his address, said that “From the moment I get up in the morning to the time I go to sleep, people like Arnab Goswami, Barkha Dutt, Digvijay Singh, Manish Tewari, NaMo, Rahul Gandhi, Prime Minister’s Office, Renuka Chowdhary, Shashi Tharoor, Beni Prasad Verma, Ajay Maken, Madhu Kishwar, etc. etc. captivate people’s imagination with their creativity. Their every word, every phrase, every sentence, every tweet and every silence is like a Molotov cocktail hurled into social networks’ front courtyard. In the ensuing melee, no one has the time and inclination to read Faking News posts. Therefore, I am asking Firstpost, CNN-IBN and IBN7 themselves to innovate and manufacture both real news and satire, all in a day’s work.”

“Before coming to this press conference, I called up the head honchos of Times Now, NDTV and other news channels; and, the media relations chiefs of major political parties, to congratulate them on their success. They deserve it!” a visibly relieved Sai Kumar added.

Faking News will officially cease operations on this Republic Day.